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161 व 164 में अन्तर

88 views 2 October 20, 2018 smartepolice

161 सीआरपीसी व 164 सीआरपीसी का बयान क्या है और कैसे दर्ज किया जाता है ?–

161 सीआरपीसी का बयानः-

1-  कोई पुलिस अधिकारी जो दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन विवेचना कर रहा है, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से परिचित किसी व्यक्ति की मौखिक परीक्षा कर सकता है, परन्तु यदि किसी ऐसी स्त्री का कथन लिया जाना हो जिसके साथ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354, 354क, 354ख, 354ग, 354घ, 376, 376क, 376ख, 376ग, 376घ, 376ड़ या धारा 509 के अपराध किये जाने या प्रयत्न किये जाने का आरोप है तो उसका कथन किसी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा अथवा उपस्थिति में अभिलिखित की जायेगी तथा वीडियो रिकार्डिंग भी की जायेगी।

2-  ऐसा व्यक्ति जिससे विवेचक पूछताछ कर रहा है, सभी प्रश्नों का सही उत्तर देने के लिये बाध्य होगा, अलावा उन प्रश्नों के जिनके उत्तर की प्रवृत्ति उसे आपराधिक आरोप या दण्ड की आशंका में डालने की हो।

3-   पुलिस अधिकारी इस धारा के अधीन मौखिक परीक्षा के दौरान उसके समक्ष किये गये किसी भी कथन को लेखबद्ध कर सकता है और यदि लेखबद्ध करता है तो प्रत्येक ऐसे व्यक्ति के कथन का पृथक और सही अभिलेख बनायेगा (धारा 161 सीआरपीसी की उपधारा 3 के अधीन किये गये किसी कथन का अभिलेखन आडियो/वीडियो व इलेक्ट्रानिक साधनों से भी किया जा सकेगा)।

164 सीआरपीसी का बयानः- इस धारा में अभियुक्त की संस्वीकृति व गवाहों के कथन मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये जाते हैं, जिसका पूर्ण विवरण इस प्रकार है।

1- कोई महानगर मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट चाहे उसे मामले में अधिकारिता हो या ना हो अन्वेषण के दौरान जाँच या विचारण प्रारम्भ होने से पूर्व किसी समय की गयी संस्वीकृति या कथन को अभिलिखित कर सकता है। धारा 164 (1) सीआरपीसी के अधीन की गयी संस्वीकृति या कथन किसी अपराध के अभियुक्त के अधिवक्ता की उपस्थिति में श्रव्य, दृश्य, या इलेक्ट्रानिक साधन के द्वारा भी अभिलिखित की जा सकेगी।

2-  मजिस्ट्रेट किसी ऐसी संस्तुति को लिखने से पूर्व संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति को समझायेगा कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के लिये आबद्ध नहीं है और यदि वह उसे करेगा तो उसके विरूद्ध साक्ष्य में उपयोग में लाई जा सकती है और मजिस्ट्रेट उसे तब तक नहीं लिखेगा जब तक उसे करने वाले व्यक्ति से प्रश्न करने पर यह विश्वास करने का कारण न हो कि वह स्वेच्छा से की जा रही है।

3-  संस्वीकृति करने से पूर्व यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने वाला व्यक्ति यह कहता है कि वह संस्वीकृति नहीं करना चाहता तो उस व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में देने का आदेश नहीं किया जायेगा।

4-  ऐसी संस्वीकृति में किसी अभियुक्त व्यक्ति की परीक्षा करने में धारा 281 सीआरपीसी में उपबन्धित रीति से अभिलिखित की जायेगी और संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति द्वारा उस पर हस्ताक्षर किये जायेंगे और मजिस्ट्रेट ऐसे अभिलेख नीचे निम्नलिखित भाव का ज्ञापन लिखेगाः-

“मैंने (अभियुक्त का नाम) को यह समझा दिया है कि वह संस्वीकृति करने के लिये आबद्ध है और यदि वह ऐसा करता है तो कोई संस्वीकृति, जो वह करेगा, उसके विरूद्ध साक्ष्य में उपयोग में लाई जा सकती है और मुझे विश्वास है कि यह संस्वीकृति स्वेच्छा से की गयी है। यह मेरी उपस्थिति में मेरे सुनने में लिखी गई है और जिस व्यक्ति ने यह संस्वीकृति की है उसको पढ़ कर सुना दी गयी है और उसने उसका सही होना स्वीकार किया है और उसके द्वारा किये गये कथन का पूरा व सही वृतान्त इसमें है”।

 

हस्ताक्षर मजिस्ट्रेट

 

5-  उपधारा (1) में किया गया संस्वीकृति से भिन्न कोई कथन साक्ष्य अभिलिखित करने के लिये इसमें इसके बाद उपबन्धित ऐसी रीति से अभिलिखित किया जायेगा, जो मजिस्ट्रेट की राय में उस मामले की परिस्थितियों में सर्वाधिक उपयुक्त हो और मजिस्ट्रेट को उस व्यक्ति को शपथ दिलाने की शक्ति होगी जिसका कथन इस प्रकार अभिलिखित किया जाना है।

5.क (क)- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 354, 354क, 354ख, 354ग, 354घ, 376 की उपधारा (1) या उपधारा (2), 376क, 376ख, 376ग, 376घ, 376ड़ या धारा 509 के अधीन दण्डनीय मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट उपधारा 5 में विहित रीति से उस व्यक्ति का कथन अंकित करेगा जिसके विरूद्ध ऐसा अपराध किया गया है जैसे ही अपराध का किया जाना पुलिस की जानकारी में लाया जाता है। परन्तु यदि कथन करने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त है तो मजिस्ट्रेट कथन लिखने में किसी द्विभाषिये या विशेष प्रबोधक की सहायता लेगा। परन्तु यह और कि यदि कथन करने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त है तो मजिस्ट्रेट किसी द्विभाषिये या विशेष प्रबोधक की सहायता से उस व्यक्ति द्वारा दिये गये कथन की वीडियोग्राफी तैयार की जायेगी।

(ख)- अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से निःशक्त किसी व्यक्ति के उपधारा (क) अधीन अभिलिखित कथन भारतीय साक्ष्य अधिनियम 137 में यथाविर्निदिष्ट मुख्य परीक्षा के स्थान पर एक कथन माना जायेगा और ऐसा कथन करने वाले की, विचारण के समय उसको अभिलिखित करने की आवश्यकता के बिना, ऐसे कथन पर प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी। (संशोधन 2013)

6- इस धारा के अधीन अभिलिखित किये गये कथन या संस्वीकृति को अभिलिखित करने वाले मजिस्ट्रेट, उसे उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा जिसके द्वारा मामले की जाँच या विचारण किया जाना है।

धारा 164क दण्ड प्रक्रिया संहिताः- इस धारा में बलात्संग की पीड़ित महिला के डाक्टरी परीक्षण के बारे में प्रावधान किये गये हैं, जो निम्न प्रकार के हैः-

1-  जब बलात्संग या बलात्संग के प्रयत्न के अपराध का अन्वेषण किया जा रहा हो अपराध की पीड़िता के शरीर का परीक्षण चिकित्सा विशेषज्ञ से कराया जाना हो वहाँ ऐसी परीक्षा सरकार के या किसी स्थानीय अधिकारी द्वारा चलाये जा रहे अस्पताल में नियोजित रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा अधिकारी द्वारा और ऐसे व्यवसायी की अनुपस्थिति में अन्य किसी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा ऐसी महिला की सहमति से या उसकी ओर से ऐसी सहमति देने के लिये सक्षम व्यक्ति की सहमति से करायी जायेगी और ऐसी महिला को, ऐसा अपराध किये जाने की सूचना प्राप्त होने के 24 घण्टे के भीतर ऐसे रजिस्ट्रीकृत व्यवसायी के पास भेजा जायेगा।

2-  ऐसा रजिस्ट्रीकृत व्यवसायी उस महिला के शरीर की बिना किसी विलम्ब के परीक्षा करेगा और एक परीक्षा रिपोर्ट तैयार करेगा, जिसमें निम्नलिखित विवरण दिये जायेंगे –

  1. उस महिला और उसे लाने वाले व्यक्ति का नाम व पता।
  2. महिला की आयु।
  3. डी0एन0ए0 परीक्षण के लिये उस महिला के शरीर से ली गई सामग्री का विवरण।
  4. महिला के शरीर पर क्षति के चिन्ह यदि कोई हों।
  5. महिला की साधारण मानसिक दशा।
  6. उचित ब्यौरे सहित अन्य तात्विक विशिष्टियाँ।

3-  रिपोर्ट में उन कारणों का उल्लेख किया जायेगा जिनके आधार पर प्रत्येक निष्कर्ष निकाला गया।

4-  रिपोर्ट में यह लिखा जायेगा कि महिला की सहमति या उसकी ओर से सहमति देने के सक्षम व्यक्ति की सहमति प्राप्त कर ली गयी है।

5-  रिपोर्ट में परीक्षा प्रारम्भ करने व समाप्त करने का सही समय भी अंकित किया जायेगा।

6-  रजिस्ट्रीकृत व्यवसायी बिना विलम्ब के अपनी रिपोर्ट अन्वेषण अधिकारी को भेजेगा जो उसे धारा 173 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार निर्दिष्ट मजिस्ट्रेट को भेजेगा।

7-  इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिये कि वह महिला की सहमति के बिना या उसकी ओर से सहमति देने के लिये सक्षम किसी व्यक्ति की सहमति के बिना किसी परीक्षा को विधिमान्य बनाती है।

नमूना बयान गवाह

 

धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता व 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता में अन्तरः-

क्र0सं0 धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता
1 विवेचक द्वारा बयान दर्ज किया जाता है। महानगर मजिस्ट्रेट अथवा न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा बयान दर्ज किया जाता है।
2 बयानकर्ता से हस्ताक्षर नहीं कराया जाता है। बयानकर्ता का हस्ताक्षर कराया जाता है।
3 साक्ष्य के रूप में उपयोग में नहीं लाया जा सकता है। (धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के तथ्यों को छोड़कर) साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है।

 

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